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विस्तृत उत्तर
वितल लोक में संगीत और वाद्य विलासिता के प्रमुख अंग हैं। नारद जी के वर्णन के अनुसार दानवों और दैत्यों के पुत्र-पुत्रियाँ निरंतर संगीत, वाद्य यंत्रों, वीणा, वेणु और मृदंग के आनंद में डूबे रहते हैं। वितल लोक के निवासी सदा मदिरा, सुमधुर संगीत, वीणा, वेणु और मृदंग की ध्वनि में मग्न रहते हैं। यह संगीत उनके ऐंद्रिय सुख और भौतिक विलासिता से भरे जीवन का भाग है।
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