विस्तृत उत्तर
कीर्तन और भजन — दोनों भक्ति-संगीत के रूप हैं परंतु इनमें कुछ महत्वपूर्ण अंतर है।
भजन —
भजन 'भज' धातु से बना है जिसका अर्थ है — भजना, उपासना करना, सेवा करना। भजन सामान्यतः एकल या अर्ध-एकल रचना होती है। इसमें भक्त अपने हृदय की भावनाओं को काव्य और संगीत के माध्यम से व्यक्त करता है। भजन में शब्द, राग और भाव की एक स्थिर संरचना होती है। कबीर, सूर, मीरा, तुलसी के पद — ये भजन हैं। भजन सुनने या गाने में व्यक्तिगत अनुभव होता है — यह ध्यान के निकट है।
कीर्तन —
कीर्तन 'कीर्त' धातु से बना है जिसका अर्थ है — प्रसिद्धि करना, गुण-गान करना। कीर्तन मुख्यतः सामूहिक और प्रश्नोत्तर (call-and-response) शैली में होता है — एक व्यक्ति गाता है, बाकी दोहराते हैं। कीर्तन में उत्साह, ऊर्जा और गति अधिक होती है। इसमें करताल, मृदंग और वाद्य-यंत्रों का प्रयोग अधिक होता है। नवधा भक्ति में कीर्तन अलग अंग है जिसका अर्थ है भगवान का नाम और गुण सार्वजनिक रूप से गाना।
सार अंतर —
भजन = एकांत, ध्यान-भाव, व्यक्तिगत अनुभव, काव्यात्मक।
कीर्तन = सामूहिक, उत्साह, सार्वजनिक, प्रश्नोत्तर-शैली।
दोनों का उद्देश्य एक है — भगवान की ओर मन लगाना — परंतु प्रकृति और शैली भिन्न है।





