विस्तृत उत्तर
भैरव अवतार भगवान शिव के सबसे उग्र और रोद्र अवतारों में से एक है। इस अवतार का कारण ब्रह्मा जी का अहंकार था।
शिव पुराण और स्कंद पुराण में इस अवतार की कथा इस प्रकार है — एक समय ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु के बीच इस बात को लेकर विवाद छिड़ा कि त्रिदेवों में सर्वश्रेष्ठ कौन है। विवाद गहरा हुआ और दोनों चारों वेदों के पास पहुँचे। वेदों ने एकमत से शिव को ही सर्वश्रेष्ठ बताया। किंतु ब्रह्मा जी का अहंकार शांत नहीं हुआ। उन्होंने अपने पाँचवें मुख से शिव के विषय में अपमानजनक वचन कहे और शिव को अपना ही पुत्र घोषित करके उन्हें अपनी सेवा में आने को कहा।
ब्रह्मा का यह अहंकारपूर्ण व्यवहार देखकर शिव अत्यंत क्रोधित हो गए। उसी क्षण उनकी भृकुटि के मध्य से एक महाभयंकर तेजस्वी पुरुष प्रकट हुआ — यही काल भैरव हैं। शिव ने उन्हें 'काल का राजा' कहकर काशी का आधिपत्य दिया।
काल भैरव ने अपनी अँगुली के नाखून से ब्रह्मा जी का वह पाँचवाँ सिर काट दिया जो अहंकार से पूर्ण था। इससे भैरव पर ब्रह्मा-हत्या का दोष लगा। प्रायश्चित के लिए वे ब्रह्मा का कपाल हाथ में लेकर तीर्थों में भटकते रहे। जब काशी पहुँचे तो वहाँ उनके हाथ से कपाल गिर गया और उन्हें ब्रह्म-हत्या के पाप से मुक्ति मिली। तभी से काल भैरव काशी के कोतवाल हैं।



