विस्तृत उत्तर
भगवान शिव के ब्रह्मचारी अवतार का मुख्य उद्देश्य पार्वती जी की तपस्या और उनके प्रेम की परीक्षा लेना था।
शिव पुराण में वर्णित है कि जब माता पार्वती ने शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तप किया और उनकी भक्ति गहन हो गई, तब शिव जी ने यह जानना चाहा कि पार्वती का प्रेम सच्चा है या केवल रूप और वैभव की कामना है। क्या वे किसी के मुख से शिव की निंदा सुनकर भी अपने निश्चय पर अडिग रह सकती हैं?
इसलिए शिव जी ने एक युवा ब्रह्मचारी तपस्वी का रूप धारण किया और पार्वती के तप-स्थल पर पहुँचे। उन्होंने पहले पार्वती की तपस्या की प्रशंसा की, फिर धीरे-धीरे शिव की आलोचना करने लगे — उन्हें श्मशानवासी, औघड़, भूतों का स्वामी, वेश-भूषा से हीन और गृहस्थ जीवन के अयोग्य बताया।
पार्वती जी ने उस ब्रह्मचारी की शिव-निंदा सुनकर क्रोध व्यक्त किया और कहा कि वे ऐसी बात सुनना नहीं चाहतीं। जब ब्रह्मचारी ने बार-बार शिव की निंदा की, तो पार्वती उठकर वहाँ से जाने लगीं। इस अटल निष्ठा और प्रेम को देखकर शिव जी अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए और माता पार्वती के अखंड प्रेम को स्वीकार करते हुए विवाह का प्रस्ताव दिया।




