विस्तृत उत्तर
महाभारत के वन पर्व में वर्णित शिव के किरात अवतार की यह कथा अत्यंत रोचक और शिव-भक्ति का एक सुंदर प्रसंग है।
पांडवों के वनवास काल में भगवान कृष्ण और महर्षि व्यास की सलाह पर अर्जुन दिव्य अस्त्र प्राप्त करने के उद्देश्य से हिमालय के इन्द्रकील पर्वत पर भगवान शिव की घोर तपस्या करने गए। अर्जुन ने मास-मास निराहार, कठोर तप किया।
इसी समय दुर्योधन द्वारा भेजा गया मूकासुर नामक दैत्य शूकर (सुअर) का रूप धारण करके अर्जुन को मारने के लिए आया। उधर भगवान शिव माता पार्वती और अपने गणों के साथ किरात वेश धारण करके वहाँ पहुँचे — उनका उद्देश्य अर्जुन की परीक्षा लेना था।
शूकर को देखकर अर्जुन ने और किरात वेषधारी शिव ने एक साथ बाण चलाए। मूकासुर ढेर हो गया। दोनों में विवाद हुआ कि शूकर का वध किसके बाण से हुआ। विवाद युद्ध में बदला। अर्जुन ने किरात पर असंख्य बाण चलाए परंतु किरात (शिव) पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अर्जुन का धनुष टूट गया, तरकस खाली हो गया, तब उन्होंने तलवार, ढाल, गदा सब आज़माए — सब व्यर्थ रहे। अंत में अर्जुन ने पत्थरों से प्रहार किया।
जब अर्जुन थककर हार मानने लगे और शिव के चरणों में माथा टेककर अपनी पराजय स्वीकार की, तब शिव जी अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए। अर्जुन की वीरता और भक्ति से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें पाशुपतास्त्र प्रदान किया।





