विस्तृत उत्तर
पाशुपतास्त्र को प्राप्त करना कोई सरल कार्य नहीं था। यह दिव्यास्त्र केवल उन्हीं को प्राप्त होता था जो इसके योग्य होते थे और भगवान शिव की असीम कृपा के पात्र बनते थे। इसे प्राप्त करने का मार्ग अत्यंत कठिन तपस्या, अटूट भक्ति और पूर्ण समर्पण से होकर गुजरता था। केवल तपस्या ही पर्याप्त नहीं थी बल्कि इसके साथ ही इसे धारण करने, सही तरीके से प्रयोग करने और सबसे महत्वपूर्ण इसका उपसंहार अर्थात इसे वापस लेने की विधि का दिव्य ज्ञान भी आवश्यक था। पात्रता के लिए शुद्ध हृदय और धर्मपरायण उद्देश्य भी अनिवार्य था।
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