विस्तृत उत्तर
काल भैरव अवतार में शिव जी ने अनेक कार्य किए जो धर्म की पुनर्स्थापना और अहंकार के दमन से संबंधित थे।
पहला कार्य — अहंकार का नाश: जब ब्रह्मा जी ने अहंकारवश शिव का अपमान किया, तो काल भैरव ने ब्रह्मा के उस पाँचवें सिर को अपनी अँगुली के नाखून से काट दिया जो अहंकार से पूर्ण था और जिससे शिव के प्रति अपमानजनक वचन निकले थे। इस कृत्य से ब्रह्मा का दंभ चूर हुआ।
दूसरा कार्य — काशी का आधिपत्य: शिव जी ने काल भैरव को वरदान दिया कि मुक्तिपुरी काशी का आधिपत्य सदा उन्हीं का रहेगा। काशी वासियों के शासक और मुक्तिदाता भैरव होंगे। आज भी काल भैरव को काशी का 'कोतवाल' माना जाता है और उनके दर्शन के बिना काशी यात्रा अधूरी मानी जाती है।
तीसरा कार्य — प्रायश्चित और तीर्थाटन: ब्रह्मा का कपाल (सिर) हाथ में लेकर भैरव ब्रह्म-हत्या के पाप से मुक्ति के लिए तीनों लोकों में भटकते रहे। जब वे काशी पहुँचे तो उनके हाथ से कपाल गिर गया और वे पाप-मुक्त हो गए। वह स्थान 'कपाल मोचन' तीर्थ के नाम से जाना जाता है।
भैरव का वाहन काला कुत्ता है और हाथ में दंड है। वे न्याय के देवता और रक्षक हैं। उनकी पूजा से भय, नकारात्मक शक्तियाँ और शत्रु-भय नष्ट होते हैं।





