विस्तृत उत्तर
काशी को शिव की नगरी कहने के पीछे शिव पुराण और स्कंद पुराण में विस्तृत वर्णन है।
अविमुक्त क्षेत्र — शिव पुराण में काशी को 'अविमुक्त क्षेत्र' कहा गया है — ऐसा स्थान जिसे शिव कभी नहीं छोड़ते। 'काशी' नाम का अर्थ ही है — 'का' = प्रकाश, 'शी' = देने वाला — कर्म के बंधनों से प्रकाश देने वाला। काशी शिव के त्रिशूल पर स्थित बताई जाती है।
शिव का स्वयं निवास — पुराणों के अनुसार काशी का प्रादुर्भाव स्वयं शिव की इच्छा से हुआ। शिव ने अपने अंश 'अविमुक्त लिंग' को काशी में स्थापित किया और आदेश दिया कि प्रलयकाल में भी काशी का नाश नहीं होगा।
तारक मंत्र — स्कंद पुराण में कहा गया है कि जो प्राणी काशी में प्राण त्यागता है उसे शिव स्वयं 'तारक मंत्र' प्रदान करते हैं जिससे वह पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त हो जाता है। काशी में मृत्यु भय नहीं, दीक्षा है।
काल भैरव — भैरव ने काशी में ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति पाई और शिव ने उन्हें काशी का कोतवाल बनाया। यह भी काशी के शिव-नगरी होने का प्रमाण है।
काशी विश्वनाथ — 12 ज्योतिर्लिंगों में काशी विश्वनाथ सातवाँ ज्योतिर्लिंग है और मोक्षदायी माना जाता है।





