विस्तृत उत्तर
स्कंद पुराण के काशी खंड (अध्याय ५३-५४) में इस कथा का विस्तृत वर्णन है।
राजा दिवोदास के शासनकाल में एक विशेष परिस्थिति के कारण भगवान शिव कुछ समय के लिए काशी छोड़कर मंदराचल पर्वत पर चले गए।
परंतु शिव को अपनी प्रिय नगरी काशी की निरंतर स्मृति आती थी। काशी की वस्तुस्थिति जानने के लिए उन्होंने क्रमशः योगिनियों, सूर्य देवों, और ब्रह्मा जी को भेजा — परंतु काशी की दिव्य आध्यात्मिक माया से वशीभूत होकर कोई भी वापस नहीं लौटा।
तब शिव ने अपने शिवगणों को भेजा। स्कंद पुराण कहता है — 'हे घंटाकर्ण आओ! हे महोदर, तुम दोनों शीघ्र काशी जाओ और वहाँ की स्थिति जानो।'
परंतु घंटाकर्ण और महोदर भी काशी के अलौकिक आकर्षण से मुग्ध होकर वहीं रह गए, उन्होंने शिवलिंग स्थापित कर दिए और आज तक वापस नहीं लौटे। पुराण कहता है — 'ये दोनों गण काशी पहुँचकर आज तक वापस नहीं लौटे। घंटाकर्ण ने वहाँ शिवलिंग स्थापित कर अत्यधिक तपस्या की।'





