विस्तृत उत्तर
इंद्र देव के वज्र की कथा त्याग और बलिदान की एक महान पौराणिक गाथा है, जो श्रीमद्भागवत महापुराण के षष्ठ स्कंध में और स्कंद पुराण में विस्तार से मिलती है। वृत्रासुर नामक महाशक्तिशाली दैत्य ने देवताओं को स्वर्गलोक से खदेड़ दिया था। उसे वरदान था कि किसी भी सामान्य अस्त्र-शस्त्र से उसका वध नहीं हो सकता। भगवान विष्णु और शिव ने देवताओं को उपाय बताया कि यदि महर्षि दधीचि अपनी अस्थियों का दान करें तो उनसे ऐसा वज्र बनाया जा सकता है जो वृत्रासुर को नष्ट कर सके, क्योंकि दधीचि की हड्डियों में वर्षों की तपस्या का ब्रह्मतेज था। इंद्र देव सभी देवताओं के साथ महर्षि दधीचि के आश्रम पहुँचे और अपनी विवशता बताई। महर्षि दधीचि ने लोककल्याण के लिए अपने प्राण स्वेच्छा से त्याग दिए। देवशिल्पी विश्वकर्मा ने उनकी पीठ की हड्डी से 'वज्र' नामक अत्यंत शक्तिशाली अस्त्र बनाया। इस वज्र के बल पर इंद्र ने वृत्रासुर के साथ घोर युद्ध किया और अंततः उसका संहार किया। दधीचि का यह त्याग भारतीय संस्कृति में परोपकार और देहदान का सबसे उज्ज्वल उदाहरण माना जाता है।





