विस्तृत उत्तर
घंटाकर्ण की मोक्ष-प्राप्ति की कथा हरि-हर एकता का परम प्रमाण है।
भगवान शिव उसकी घोर तपस्या से प्रसन्न हुए और दर्शन दिए। जब घंटाकर्ण ने मोक्ष का वरदान माँगा, तो शिव ने स्पष्ट कहा कि मोक्ष देने का सामर्थ्य केवल भगवान विष्णु (कृष्ण) में है।
शिव की आज्ञा मानकर घंटाकर्ण बदरिकाश्रम (बद्रीनाथ) गया, जहाँ श्रीकृष्ण ऋषियों के साथ तपस्यारत थे। अपनी पिशाच वृत्ति के अनुसार उसने श्रीकृष्ण को एक मृत ब्राह्मण के माँस का आधा खाया हुआ भाग भेंट स्वरूप प्रस्तुत किया।
श्रीकृष्ण ने उसकी उग्र पर निश्छल भक्ति देखकर उसे फटकारा नहीं — बल्कि कोमलता से भेंट अस्वीकार करते हुए सखा भाव से गले लगा लिया। भगवान के स्पर्श मात्र से घंटाकर्ण की पिशाच योनि छूट गई और उसने अठारह भुजाओं वाला दिव्य शिवगण-स्वरूप प्राप्त किया।
इसीलिए आज भी बद्रीनाथ धाम के माणा गाँव में घंटाकर्ण रक्षक देवता के रूप में पूजित हैं।





