विस्तृत उत्तर
घंटाकर्ण पूर्वकाल में एक पिशाच योनि का प्राणी था जो मनुष्यों का भक्षण करता था। भागवत पुराण, शिव पुराण और हरिवंश पुराण (भविष्य पर्व, अध्याय ८०) में इसका वर्णन मिलता है।
वह भगवान शिव का अनन्य भक्त था, परंतु भगवान विष्णु से उसे इतनी तीव्र घृणा थी कि वह उनके नाम का एक अक्षर भी सुनना नहीं चाहता था। इसी कारण उसने अपने कानों में बड़े-बड़े घंटे लटका लिए थे। जब भी कोई विष्णु या नारायण का नाम लेता, वह अपने सिर को तीव्रता से हिलाता — जिससे घंटे बजते और उनकी ध्वनि विष्णु-नाम को कानों तक पहुँचने से रोक देती।
इसी कारण उसका नाम 'घंटाकर्ण' — अर्थात् 'जिसके कानों में घंटे हों' — पड़ गया। 'घनकर्ण' नाम भी इसी शिवगण को इंगित करता है — 'घन' का अर्थ संस्कृत में आघात से बजने वाला वाद्य (जैसे मंजीरा, घंटा) और 'कर्ण' का अर्थ कान। ये दोनों नाम स्कंद पुराण के काशी खंड में प्रयुक्त हुए हैं।
तांत्रिक प्रतीकात्मकता में यह ऐसे साधक की अवस्था है जो बाहरी कोलाहल को रोककर केवल भीतर के नाद पर ध्यान केंद्रित करता है।
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