विस्तृत उत्तर
प्रेत, पिशाच, भूत, यक्ष और राक्षस योनियों से यह शिक्षा मिलती है कि मनुष्य का स्थूल शरीर नश्वर है, परंतु उसका सूक्ष्म शरीर उसके कर्मों के संस्कारों को वहन करता है। जीवात्मा का पतन तीन प्रमुख कारणों से होता है: धर्म से च्युति और महापातक, मृत्यु के समय भयंकर क्रोध या वस्तु-व्यक्ति के प्रति अत्यधिक मोह, और मृत्यु के बाद वैदिक संस्कारों की अवहेलना। पाँच महापातक—ब्रह्महत्या, सुरापान, स्वर्ण-चोरी, गुरुपत्नी गमन और गोहत्या—जीवात्मा को भयंकर नरकों और तदुपरांत तामसिक योनियों में धकेलते हैं। मृत्यु के समय मतिभ्रम, क्रोध या तीव्र आसक्ति भूत या यक्ष योनि का कारण बनती है। अंत्येष्टि, दशगात्र और पिण्डदान का अभाव जीवात्मा को वायव्य शरीर में फँसा देता है, जिससे वह प्रेत बनकर भटकती है। इन योनियों से मुक्ति का मार्ग प्रायश्चित, श्राद्ध, पिण्डदान और श्रीमद्भागवत जैसे पवित्र ग्रंथों का श्रवण बताया गया है। इसलिए मनुष्य को अपने कर्मों के प्रति सचेत रहना चाहिए, धर्म का आचरण करना चाहिए, आसक्तियों का त्याग करना चाहिए और वैदिक जीवन शैली अपनानी चाहिए।
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