विस्तृत उत्तर
पौराणिक कथा के अनुसार, राजा विदुर का पुत्र तामसिक प्रवृत्तियों के कारण मुर्गों का निर्दयतापूर्वक भक्षण करता था। मुर्गों के राजा 'ताम्रचूड़' ने उसे शाप दिया कि वह क्षय रोग से पीड़ित होगा और रात्रि में 'मुर्ग' (तिर्यक् योनि) में बदल जाएगा। जब उस राजकुमार ने कुक्कुटेश्वर लिंग की शरण में जाकर पूजा की, तब उसे इस शाप और पशु योनि से मुक्ति मिली। यह कथा तांत्रिक सत्य को उद्घाटित करती है कि तामसिक वृत्तियाँ मनुष्य को आध्यात्मिक रूप से 'पशु' बना देती हैं। कुक्कुटेश्वर लिंग की साधना मनुष्य के भीतर के इसी अचेतन पशुत्व (Animalistic instincts) को नष्ट कर उसे पुनः शुद्ध मानवीय और शिव-चेतना में स्थापित करती है। यह लिंग गिरे हुए साधक को भी परम पद तक उठा सकता है।





