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केरल तंत्र में घंटाकर्ण का क्या स्वरूप है?

केरल दारुकजित विद्या में घंटाकर्ण शिव के कर्ण-मल से उत्पन्न — भद्रकाली के रक्षक 'पुलि-भैरव'। प्रेत-बाधा और नकारात्मक ऊर्जाओं से रक्षा उनकी भूमिका।

संक्षिप्त उत्तर

केरल दारुकजित विद्या में घंटाकर्ण शिव के कर्ण-मल से उत्पन्न — भद्रकाली के रक्षक 'पुलि-भैरव'। प्रेत-बाधा और नकारात्मक ऊर्जाओं से रक्षा उनकी भूमिका। तीनों परंपराओं में वे उग्र रक्षक देवता हैं।

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विस्तृत उत्तर

केरल की तांत्रिक विद्या (दारुकजित विद्या) में घंटाकर्ण का सर्वथा भिन्न स्वरूप मिलता है।

इस परंपरा के अनुसार घंटाकर्ण शिव के कर्ण-मल (Ear wax) से उत्पन्न हुए। वे भद्रकाली (काली का उग्र रूप) के रक्षक 'पुलि-भैरव' के रूप में पूजित हैं।

केरल तांत्रिक विद्या में उनकी भूमिका प्रेत-बाधा, तंत्र-मंत्र और नकारात्मक ऊर्जाओं से रक्षा करना है।

यह स्वरूप हिंदू पुराणों (जहाँ वे पिशाच से शिवगण बने) और जैन परंपरा (जहाँ वे ५२ वीरों में एक हैं) — दोनों से भिन्न है। तथापि तीनों परंपराओं में एक मूल समानता है — घंटाकर्ण सर्वत्र दुष्ट शक्तियों और नकारात्मक ऊर्जाओं का संहार करने वाले उग्र रक्षक देवता हैं।

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केरल तंत्र में घंटाकर्ण का क्या स्वरूप है को संदर्भ सहित समझें

केरल तंत्र में घंटाकर्ण का क्या स्वरूप है का सबसे सीधा सार यह है: केरल दारुकजित विद्या में घंटाकर्ण शिव के कर्ण-मल से उत्पन्न — भद्रकाली के रक्षक 'पुलि-भैरव'। प्रेत-बाधा और नकारात्मक ऊर्जाओं से रक्षा उनकी भूमिका। तीनों परंपराओं में वे उग्र...

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