विस्तृत उत्तर
केरल की तांत्रिक विद्या (दारुकजित विद्या) में घंटाकर्ण का सर्वथा भिन्न स्वरूप मिलता है।
इस परंपरा के अनुसार घंटाकर्ण शिव के कर्ण-मल (Ear wax) से उत्पन्न हुए। वे भद्रकाली (काली का उग्र रूप) के रक्षक 'पुलि-भैरव' के रूप में पूजित हैं।
केरल तांत्रिक विद्या में उनकी भूमिका प्रेत-बाधा, तंत्र-मंत्र और नकारात्मक ऊर्जाओं से रक्षा करना है।
यह स्वरूप हिंदू पुराणों (जहाँ वे पिशाच से शिवगण बने) और जैन परंपरा (जहाँ वे ५२ वीरों में एक हैं) — दोनों से भिन्न है। तथापि तीनों परंपराओं में एक मूल समानता है — घंटाकर्ण सर्वत्र दुष्ट शक्तियों और नकारात्मक ऊर्जाओं का संहार करने वाले उग्र रक्षक देवता हैं।




