विस्तृत उत्तर
मारण मंत्र तंत्रशास्त्र के 'षट्कर्म' (छह प्रकार के तांत्रिक कर्म) में से एक है। तंत्र के षट्कर्म हैं — शान्ति, वशीकरण, स्तम्भन, विद्वेषण, उच्चाटन और मारण। इनमें 'मारण' वह प्रयोग माना जाता था जिसका उद्देश्य किसी शत्रु को नुकसान पहुँचाना या मृत्यु की ओर ले जाना था।
शास्त्रीय दृष्टि से क्या कहा गया है: अथर्ववेद संहिता में अभिचार-कर्म (शत्रु को हानि पहुँचाने की क्रियाएँ) का उल्लेख मिलता है, परन्तु आधुनिक तंत्र के मारण प्रयोगों का सीधा सम्बन्ध वैदिक परम्परा से नहीं है। तंत्र साहित्य ईसवी चौथी-पाँचवीं शताब्दी के बाद विकसित हुआ। प्राचीन ओझा परम्परा में मारण का प्रचलन था जहाँ शत्रु की प्रतिमा बनाकर अनुष्ठान किए जाते थे।
व्यावहारिक सच्चाई: तंत्र-मंत्र विशेषज्ञों और आधुनिक मनोविज्ञान दोनों दृष्टियों से देखने पर मारण-प्रयोगों की सफलता का कोई प्रमाणित वैज्ञानिक आधार नहीं है। जब भी कोई मृत्यु संयोगवश होती थी, उसे मारण का फल माना जाता था — यह मनोवैज्ञानिक संयोग-विश्वास (confirmation bias) है।
नैतिक और धार्मिक दृष्टिकोण: शास्त्र स्पष्ट रूप से कहते हैं कि किसी अन्य की हानि के लिए मंत्र-प्रयोग करना पाप है और इससे प्रयोगकर्ता को भी उतना ही दोष लगता है। इसीलिए अनेक सिद्ध-योगियों ने ऐसे प्रयोगों की शक्ति को कमजोर करने का प्रयास किया। धर्मशास्त्र में किसी के प्राण लेने का अधिकार किसी मनुष्य को नहीं — यह ईश्वर का क्षेत्र है।