विस्तृत उत्तर
षट्कर्म = तंत्र शास्त्र में वर्णित छह प्रकार के कर्म। वाराही तंत्र में आगम के लक्षणों में षट्कर्म साधन शामिल है।
छह कर्म
- 1शांति: शत्रु/रोग/ग्रह दोष शांत करना — सात्विक, शुभ।
- 2वशीकरण: किसी को वश में करना — राजसिक।
- 3स्तंभन: किसी को रोकना/स्थिर करना — राजसिक।
- 4विद्वेषण: दो व्यक्तियों में भेद करना — तामसिक।
- 5उच्चाटन: किसी को स्थान/कार्य से हटाना — तामसिक।
- 6मारण: किसी का नाश — अत्यंत तामसिक, महापाप।
शास्त्रीय दृष्टि
- ▸शांति कर्म = एकमात्र सात्विक — सभी कर सकते हैं।
- ▸शेष 5 = राजसिक/तामसिक — कर्म बंधन। विशेषकर विद्वेषण, उच्चाटन, मारण = महापाप।
- ▸तंत्र ग्रंथों में इनका उल्लेख = ज्ञानार्थ, प्रयोगार्थ नहीं। जैसे विषशास्त्र विष का वर्णन करता है = विष पीने के लिए नहीं।
गीता: 'कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः' — कर्म, अकर्म और विकर्म को जानना चाहिए।
ध्यान रखें: मारण, उच्चाटन, विद्वेषण = अत्यंत पापकर्म। इनका प्रयोग = कर्म बंधन + नरक। 'जैसा करोगे, वैसा भोगोगे।'


