विस्तृत उत्तर
छिन्नमस्ता दस महाविद्याओं में छठी हैं। उनका स्वरूप अत्यंत प्रतीकात्मक है — वे स्वयं अपना सिर काटकर उसे एक हाथ में धारण किए हुए हैं, और अपने ही रक्त की तीन धाराओं से अपनी दो शक्तियों (डाकिनी-वर्णिनी) को तथा स्वयं को भी पोषण दे रही हैं। यह स्वयंबलि और निःस्वार्थ भाव का चरम प्रतीक है। छिन्नमस्ता कामाख्या के बाद दूसरी सबसे लोकप्रिय शक्तिपीठ हैं — उनका मंदिर झारखंड की राजधानी राँची के पास चिंतपूर्णी और रजरप्पा में स्थित है।
छिन्नमस्ता का मुख्य मंत्र:
श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै हूं हूं फट् स्वाहा॥
इस मंत्र में श्रीं (लक्ष्मी-बीज), ह्रीं (माया-बीज), क्लीं (काम-बीज), ऐं (वाग्-बीज) — ये चार शक्ति-बीज संयुक्त हैं। 'वज्र वैरोचनी' छिन्नमस्ता का एक नाम है।
छिन्नमस्ता की उपासना से साधक में आत्मसंयम, वासना-नाश, कुण्डलिनी-जागरण और तीव्र आत्मशक्ति का विकास होता है — ऐसी तांत्रिक मान्यता है।
उनकी उग्र साधना के लिए उग्र मन से, और शांत साधना के लिए शांत मन से उपासना का विधान है। यह साधना गुरु-दीक्षा के बिना नहीं करनी चाहिए।