विस्तृत उत्तर
यह प्रश्न दो देवियों के बारे में है — धूमावती और मातंगी — दोनों दस महाविद्याओं की अत्यंत रहस्यमय शक्तियाँ हैं।
धूमावती:
दस महाविद्याओं में धूमावती सातवें स्थान पर हैं। वे एकमात्र विधवा महाविद्या हैं — उनका कोई पति नहीं है, वे स्वतंत्र शक्ति हैं। ऋग्वेद के रात्रिसूक्त में उन्हें 'सुतरा' (सुखपूर्वक तारने वाली) कहा गया है। धूमावती अभाव, दुःख और विपत्ति की अधिष्ठात्री हैं — परन्तु जो उनकी शरण में जाता है वे उसे सभी संकटों से पार कर देती हैं।
धूमावती का मुख्य मंत्र:
ऊँ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा॥
या: धूं धूं धूमावती ठः ठः।
धूं' धूमावती का बीजाक्षर है।
धूमावती की साधना विशेष परिस्थितियों में — विपत्ति-नाश, रोग-निवारण, शत्रु-उच्चाटन के लिए — तांत्रिक परम्परा में की जाती है। साधना मुख्यतः अमावस्या या रात्रि काल में होती है। यह सामान्य उपासकों के लिए नहीं है।
मातंगी:
दस महाविद्याओं में मातंगी नौवें स्थान पर हैं। वे श्रीविद्या-परम्परा की सौम्य महाविद्या हैं — ज्ञान, कला, संगीत और वाक्-सिद्धि की देवी। मतंग ऋषि (शिव का एक नाम और एक ऋषि भी) से उनका सम्बन्ध है। गृहस्थ जीवन को सुखमय और कला-कौशल को उन्नत बनाने के लिए उनकी उपासना की जाती है।
मातंगी का मुख्य मंत्र:
ॐ ह्रीं क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा॥
या: श्री ह्रीं क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा।
मातंगी की उपासना से वाक्-सिद्धि, कला-प्रवीणता, सुखी परिवार और सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है।


