विस्तृत उत्तर
माँ तारा दस महाविद्याओं में द्वितीय स्थान रखती हैं। उनका स्वरूप बहुत कुछ माँ काली से मिलता-जुलता है; वे नील वर्ण की हैं, जिसके कारण उन्हें 'नील सरस्वती' भी कहा जाता है।
भक्तों के कष्टों का हरण करने के लिए वे उग्र रूप धारण करती हैं, अतः 'उग्रतारा' नाम से भी प्रसिद्ध हैं।
वे ज्ञान, वाणी और विपत्तियों से तारने वाली शक्ति के रूप में पूजी जाती हैं।
तारा साधना ज्ञान (नील सरस्वती के रूप में) और उग्र शक्ति (उग्रतारा के रूप में) दोनों का अद्भुत संगम है, जो साधक को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही स्तरों पर सशक्त बनाने में सक्षम है।
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