विस्तृत उत्तर
माँ छिन्नमस्ता दस महाविद्याओं में एक अत्यंत उग्र और रहस्यमयी देवी हैं। उनका स्वरूप अद्वितीय और प्रतीकात्मक है:
— वे अपना मस्तक स्वयं अपने खड्ग से काटकर अपने एक हाथ में धारण करती हैं, जबकि दूसरे हाथ में खड्ग होता है।
— उनके कटे हुए धड़ से रक्त की तीन धाराएँ निकलती हैं — एक धारा को वे स्वयं पीती हैं, और अन्य दो धाराएँ उनकी सहचरियों डाकिनी और वर्णिनी (जिन्हें जया और विजया भी कहा जाता है) के मुख में जाती हैं।
— वे प्रचंड चंडिका का स्वरूप हैं और वज्र वैरोचिनी के नाम से भी जानी जाती हैं।
— उनकी गणना काली कुल की देवियों में होती है।
उनका स्वरूप मृत्यु, क्षणभंगुरता और विनाश के साथ-साथ जीवन, अमरता और पुनर्निर्माण का भी प्रतिनिधित्व करता है।
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