विस्तृत उत्तर
माँ धूमावती दस महाविद्याओं में सातवीं अथवा कुछ मतों के अनुसार अंतिम महाविद्या हैं।
माँ धूमावती प्रलय काल (सृष्टि के विनाश के समय) में प्रकट होती हैं और उस 'शून्य' या 'अभाव' का प्रतिनिधित्व करती हैं जो सृष्टि से पहले और प्रलय के बाद विद्यमान रहता है।
उनका यह स्वरूप सांसारिक आकर्षणों और मोह के त्याग का प्रतीक है। धूमावती साधना 'शून्यता' और 'अभाव' की शक्ति को समझने और उससे परे जाने पर केंद्रित है।
महाविद्याओं में उनका स्थान यह दर्शाता है कि तांत्रिक परंपरा जीवन के तथाकथित नकारात्मक पहलुओं (जैसे गरीबी, कुरूपता, हानि, अभाव) को भी दिव्यता के अनुभव और आध्यात्मिक विकास के साधन के रूप में देखती है।
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