विस्तृत उत्तर
व्याघ्रचर्म (बाघ का चर्म) आसन वेद-शास्त्रों में एक विशेष और शक्तिशाली साधना-आसन है। स्वयं भगवान शिव इस आसन का प्रयोग करते हैं।
शास्त्रीय महत्व: शास्त्रों में बताया गया है कि व्याघ्रचर्म आसन पर बैठकर साधना करने से विषैले जंतुओं का भय नहीं रहता और निर्विघ्न साधना होती है। यह रजोगुणी आसन है जिसे राजसिक वृत्ति वाले साधकों द्वारा राजसी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उपयोग में लाया जाता है।
फल: व्याघ्रचर्म पर बैठकर साधना करने से तेज, बल, साहस और राजसी सुखों की प्राप्ति होती है। साधक धन संपदा, यश, बुद्धि, विवेक और भू-संपदा प्राप्त करता है। सभी कार्य निडरता से पूर्ण होते हैं।
शिव का आसन: भगवान शिव के व्याघ्रचर्म पहनने और उस पर बैठने के पीछे तांत्रिक दर्शन है — शिव ने बाघ को वश में किया जो अहंकार का प्रतीक है। उस पर विराजना अहंकार को वश में करने का प्रतीक है।
आधुनिक परिप्रेक्ष्य: वन्यजीव संरक्षण के कारण वास्तविक व्याघ्रचर्म आसन का उपयोग संभव नहीं। इसके स्थान पर नारंगी रंग के ऊनी आसन का उपयोग किया जाता है जो समान फल देता है।




