विस्तृत उत्तर
दंडवत प्रणाम को साष्टांग प्रणाम या अष्टांग नमस्कार भी कहा जाता है। यह हिंदू धर्म में सर्वोत्तम प्रणाम माना जाता है क्योंकि इसमें शरीर के आठ अंगों से भगवान के समक्ष पूर्ण समर्पण व्यक्त होता है।
दंडवत प्रणाम की विधि इस प्रकार है:
पहले दोनों हाथों को छाती के सामने जोड़ें और कमर से आगे झुकें। फिर घुटनों के बल आएँ।
आगे झुकते हुए पहले दाहिना हाथ, फिर बायाँ हाथ जमीन पर टिकाएँ। फिर पेट के बल जमीन पर लेट जाएँ।
इस स्थिति में ठोड़ी, छाती (वक्षस्थल), दोनों हाथ, दोनों घुटने और दोनों पाँव जमीन को स्पर्श करने चाहिए। ध्यान रखें कि पेट (नाभि) जमीन से न छुए।
इस मुद्रा में रहते हुए मन में 'नमः सर्वहितार्थाय जगदाधारहेतवे। साष्टाङ्गोऽयं प्रणामस्ते प्रयत्नेन मया कृतः॥' यह मंत्र बोलें।
वस्त्र के विषय में शास्त्र में कहा गया है कि दंडवत करते समय कमर के ऊपर वस्त्र नहीं होने चाहिए। यदि संभव न हो तो कम से कम उत्तरीय (चादर या दुपट्टा) उतार लें।
दंडवत प्रणाम का आध्यात्मिक महत्व यह है कि यह अहंकार को पूरी तरह भूमि पर रखने का प्रतीक है। जैसे डंडा जमीन पर लेटा होता है, वैसे ही भक्त अपने आप को भगवान के चरणों में पूर्णतः समर्पित करता है।





