विस्तृत उत्तर
तारा दस महाविद्याओं में द्वितीय स्थान पर हैं। तांत्रिकों में तारा देवी की आराधना अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित तारापीठ उनका प्रमुख शक्तिपीठ है जहाँ सर्वप्रथम महर्षि वशिष्ठ ने तारा देवी की आराधना की थी। आर्थिक उन्नति, कठिन परिस्थितियों में सहायता और मोक्ष-प्राप्ति के लिए तारा की उपासना की जाती है।
तारा देवी का मुख्य बीज मंत्र:
ॐ ह्रीं स्त्रीं हूं फट्॥
विस्तृत तारा मंत्र:
ॐ ऐं ह्रीं स्त्रीं हूं फट्
तारा की उपासना महाकाली से मिलती-जुलती है। वे नीली काया, पिंगल जटा, मुण्डमाला धारण किये, भयंकर रूप में खड्ग और खप्पर लिए हुए दर्शाई जाती हैं। उनका वाहन शव है जिस पर वे खड़ी हैं। तारा देवी का स्वरूप महाकाली से थोड़ा भिन्न है — काली का वर्ण श्याम है जबकि तारा का नील।
तारा उग्रतारा भी कहलाती हैं। तंत्रशास्त्र में उनकी साधना विशेष रूप से उन साधकों के लिए बताई गई है जो अभावों और संकटों से घिरे हों।
नोट: दस महाविद्याओं की तांत्रिक साधना गुरु-दीक्षा के बिना नहीं की जानी चाहिए।




