विस्तृत उत्तर
भुवनेश्वरी दस महाविद्याओं में पाँचवें स्थान पर हैं। देवीपुराण के अनुसार भुवनेश्वरी ही मूल प्रकृति हैं — इसीलिए उन्हें आदिशक्ति भी कहा जाता है। 'भुवन' का अर्थ है संसार, और जो इस समस्त भुवन की ईश्वरी हैं — वही भुवनेश्वरी। वे शताक्षी और शाकम्भरी नाम से भी प्रसिद्ध हैं। दुर्गमासुर का वध इन्होंने ही किया था।
भुवनेश्वरी का स्वरूप सौम्य और अरुण-कांतिमय है। उनके चार हाथ हैं — जिनमें अंकुश, पाश, अभय और वर मुद्राएँ हैं। भक्तों को अभय और समस्त सिद्धियाँ प्रदान करना उनका स्वाभाविक गुण है।
भुवनेश्वरी का मुख्य बीज मंत्र:
ह्रीं भुवनेश्वरीयै ह्रीं नमः
विस्तृत मंत्र:
ॐ ह्रीं भुवनेश्वरीयै ह्रीं नमः
ह्रीं' भुवनेश्वरी का एकाक्षरी बीज है, जिसे माया-बीज भी कहते हैं। यह समस्त शक्ति की मूल ध्वनि मानी जाती है।
नीलसरस्वतीतन्त्र में इनका हृदय, रुद्रयामल में इनका कवच और महातन्त्रार्णव में इनका सहस्रनाम संकलित है। इनकी साधना स्फटिक की माला से ग्यारह माला प्रतिदिन करने का विधान बताया गया है। पुत्र-प्राप्ति और राजनीतिक-सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए इनकी आराधना विशेष फलदायी मानी जाती है।





