विस्तृत उत्तर
तंत्र शास्त्र में देवी (शक्ति) की उपासना सर्वोच्च स्थान रखती है। तंत्र मूलतः शिव-शक्ति का शास्त्र है।
तंत्र में देवी का स्थान
1तंत्र = शिव-शक्ति संवाद
तंत्र ग्रंथ शिव और शक्ति (पार्वती) के संवाद हैं। शिव द्वारा बोले = आगम, पार्वती द्वारा बोले = निगम। देवी इसमें श्रोता और वक्ता दोनों हैं।
2शक्ति = ब्रह्मांड की मूल शक्ति
तंत्र दर्शन: 'शिव: शक्ति विहीनश्चेत् शवतुल्यो भवेत्' — शक्ति के बिना शिव शव समान हैं। शक्ति ही सृष्टि, स्थिति, संहार की कर्ता है।
3दस महाविद्या
तंत्र में देवी के दस प्रमुख रूप (दस महाविद्या) वर्णित हैं: काली, तारा, षोडशी (त्रिपुरसुंदरी), भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला। प्रत्येक महाविद्या ब्रह्मांडीय शक्ति का एक विशिष्ट पहलू है।
4कुण्डलिनी = देवी शक्ति
तंत्र में कुण्डलिनी शक्ति (मूलाधार में सुप्त ऊर्जा) को देवी का ही रूप माना गया है। कुण्डलिनी जागरण = देवी कृपा।
5यंत्र = देवी का ज्यामितीय रूप
श्री यंत्र, काली यंत्र आदि देवी शक्ति के ज्यामितीय प्रतीक हैं। तंत्र में यंत्र पूजा अत्यंत महत्वपूर्ण।
6मंत्र = देवी की ध्वनि ऊर्जा
बीज मंत्र (ऐं, ह्रीं, क्लीं, क्रीं आदि) देवी की विभिन्न शक्तियों के ध्वनि रूप हैं।
7स्त्री = साक्षात् शक्ति
कुलार्णव तंत्र: तंत्र में स्त्री को शक्ति का साक्षात् रूप माना गया है। 'स्त्री को पुष्प से भी ताड़न नहीं करना चाहिए' — कुलार्णव तंत्र। स्त्री को गुरु पद तक प्रदान किया गया।
सार: तंत्र शास्त्र = शक्ति शास्त्र। देवी इसमें सर्वोच्च तत्व, ब्रह्मांड की मूल शक्ति, कुण्डलिनी रूप, मंत्र-यंत्र-तंत्र तीनों की अधिष्ठात्री हैं।





