विस्तृत उत्तर
पंचमकार (पाँच 'म' से शुरू होने वाले तत्व) तांत्रिक शक्ति उपासना का एक गूढ़ विषय है। इसके दो स्तर हैं — बाह्य (यथार्थ) और आध्यात्मिक (प्रतीकात्मक):
पंचमकार के नाम
- 1मद्य (मदिरा)
- 2मांस
- 3मत्स्य (मछली)
- 4मुद्रा (अनाज/हस्त मुद्रा)
- 5मैथुन (संभोग)
आध्यात्मिक/प्रतीकात्मक अर्थ (महानिर्वाण तंत्र और कुलार्णव तंत्र के अनुसार)
1मद्य = सोम रस / ज्ञान रस
सहस्रार चक्र से टपकने वाला दिव्य अमृत (सोम रस)। जब कुण्डलिनी सहस्रार पहुंचती है, तो साधक आनंद रस (ज्ञान मद्य) का पान करता है।
2मांस = जिह्वा संयम
मा' = जिह्वा, अंश = संयम। जिह्वा (वाणी और स्वाद) पर संयम रखना ही 'मांस' का वास्तविक अर्थ है। दूसरे अर्थ में — मन का मांस = अहंकार। अहंकार का त्याग करना।
3मत्स्य = प्राणायाम / इड़ा-पिंगला
दो मछलियां = इड़ा और पिंगला नाड़ी। इन दोनों नाड़ियों में प्राण के प्रवाह को नियंत्रित करना (प्राणायाम) ही 'मत्स्य' साधना है।
4मुद्रा = योग आसन / ध्यान मुद्रा
विशिष्ट हस्त मुद्रा या योग आसन जिनसे शरीर में ऊर्जा प्रवाह नियंत्रित होता है। कुछ मतों में 'मुद्रा' = भुना हुआ अन्न (शक्ति प्रदायक)।
5मैथुन = शिव-शक्ति मिलन / कुण्डलिनी जागरण
कुण्डलिनी शक्ति (शक्ति) का सहस्रार में शिव से मिलन। यह आंतरिक मैथुन (योग) है — बाह्य शारीरिक क्रिया नहीं। गोरखनाथ ने कहा: 'जब शरीर के भीतर ही शिव-शक्ति का मिलन हो जाए तो बाह्य मैथुन की आवश्यकता नहीं।'
महत्वपूर्ण
- ▸सात्विक/दक्षिणाचार साधक प्रतीकात्मक अर्थ अपनाते हैं।
- ▸वामाचार साधक (कुछ परंपराओं में) यथार्थ पंचमकार का प्रयोग करते हैं — यह केवल गुरु दीक्षा से संभव।
- ▸बिना गुरु और समझ के पंचमकार का प्रयोग अत्यंत हानिकारक।
- ▸गोरखनाथ ने वामाचार की बजाय योग मार्ग (कुण्डलिनी योग) को श्रेष्ठ बताया।





