विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के अनुसार, प्रेत योनि में जीवात्मा को वायव्य प्रधान शरीर प्राप्त होता है। उसे अत्यंत तीव्र भूख और प्यास का अनुभव होता है, परंतु भौतिक शरीर के अभाव में वह कुछ भी ग्रहण नहीं कर पाती। गरुड़ पुराण सारोद्धार में कहा गया है कि जो लोग पिण्डदान से वंचित रह जाते हैं, वे प्रेत रूप हो जाते हैं और कल्प के अंत तक निर्जन वनों में अत्यधिक दुखी होकर भटकते रहते हैं। गरुड़ पुराण यह भी बताता है कि अकाल मृत्यु, महापातक और विधिपूर्वक श्राद्ध न होने से आत्मा प्रेत बन सकती है। प्रेत बाधा होने पर मनुष्य की मति, प्रीति, रीति, लक्ष्मी और बुद्धि का विनाश हो जाता है।
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