विस्तृत उत्तर
धुंधुकारी प्रेत रूप में गोकर्ण से कहता है कि उसने अपने ही दोष से अपना ब्राह्मणत्व नष्ट किया और उसके कुकर्मों की कोई गिनती नहीं। वह लोगों की हिंसा करता था और अंत में कुलटा स्त्रियों ने उसे कष्ट देकर मार डाला। इसी कारण वह प्रेत योनि में पड़ा और वायु-आहार से दैवाधीन कर्मफल भोग रहा था। गोकर्ण ने उसके लिये गया में पिंडदान किया था, फिर भी वह मुक्त नहीं हुआ। धुंधुकारी स्वयं कहता है कि सैकड़ों गया-श्राद्ध से भी मुक्ति नहीं होगी। इस कथा में प्रेत बाधा का कारण भारी कर्मफल बताया गया है, और उससे छूटने का विशिष्ट उपाय श्रीमद्भागवत सप्ताह बताया गया है।
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