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विस्तृत उत्तर
महर्षि दधीचि के प्राण त्यागने के बाद देवशिल्पी विश्वकर्मा ने उनकी रीढ़ की हड्डी से उस दिव्य अस्त्र का निर्माण किया जिसे 'वज्र' नाम दिया गया। इस प्रकार वज्र का जन्म किसी धातु या पत्थर से नहीं, बल्कि एक महान ऋषि के आत्म-बलिदान से हुआ। यह इस बात का प्रतीक है कि ब्रह्मांड में सबसे बड़ी शक्ति पाशविक बल नहीं, बल्कि निस्वार्थ त्याग है।
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