विस्तृत उत्तर
वज्र का निर्माण देव-शिल्पी विश्वकर्मा ने किया था — महर्षि दधीचि की अस्थियों से।
निर्माण की प्रक्रिया — महर्षि दधीचि ने समाधि लगाकर देह त्याग की। कामधेनु गाय ने उनके शरीर को चाट-चाटकर मांस अलग किया और अस्थियों का पिंजर सुरक्षित निकाला। देवराज इंद्र ने वे अस्थियाँ विश्वकर्मा को दीं। विश्वकर्मा ने उन पवित्र और ब्रह्म-तेज से युक्त अस्थियों से वज्र का निर्माण किया।
एक अन्य परंपरा — कुछ ग्रंथों में उल्लेख है कि दधीचि की अस्थियों से कई दिव्य अस्त्र बने — वज्र (इंद्र का), गांडीव धनुष, पिनाक धनुष और सारंग धनुष। इस प्रकार एक ही महात्मा की अस्थियों ने अनेक देवताओं और योद्धाओं को उनके दिव्य अस्त्र दिए।
शक्ति का स्रोत — वज्र की अपार शक्ति का कारण था दधीचि की तपस्या-शक्ति और ब्रह्म-तेज जो उनकी अस्थियों में समाया हुआ था।



