विस्तृत उत्तर
वज्र-निर्माण की कथा श्रीमद्भागवत महापुराण के स्कंद 6 में विस्तार से वर्णित है।
प्रक्रिया — ब्रह्माजी की सलाह पर देवराज इंद्र महर्षि दधीचि के पास गए और उनसे अस्थि-दान का आग्रह किया। महर्षि ने बिना हिचकिचाए तत्काल स्वीकार किया। उन्होंने समाधि लगाई और अपनी देह त्याग दी।
कामधेनु की भूमिका — देवताओं के समक्ष एक कठिनाई थी — महर्षि के शरीर से मांस कैसे अलग करें। तब इंद्र ने कामधेनु गाय को बुलाया। कामधेनु ने अपनी जिह्वा से चाट-चाटकर महर्षि के शरीर का मांस अलग किया और केवल अस्थियों का पिंजर सुरक्षित रहा।
विश्वकर्मा का कार्य — देवताओं ने वे पवित्र अस्थियाँ देव-शिल्पी विश्वकर्मा को दीं। विश्वकर्मा ने दधीचि की ब्रह्म-तेज से भरपूर अस्थियों से वज्र का निर्माण किया और इंद्र को प्रदान किया।
वज्र की शक्ति — दधीचि की तपस्या-शक्ति और ब्रह्म-तेज वज्र में समाहित था। इसी कारण श्रीमद्भागवत में वृत्रासुर ने कहा — 'इस वज्र में भगवान नारायण की शक्ति, दधीचि की तपस्या और इंद्र का प्रारब्ध — तीन शक्तियाँ हैं।'





