विस्तृत उत्तर
काशी में शिवलिंगों की अनेक श्रेणियाँ हैं — स्वयंभू, देवता-स्थापित, ऋषि-स्थापित और शिवगण-स्थापित। 'शिवगण-स्थापित लिंग' का विशेष शास्त्रीय महत्त्व है।
शिवगण भगवान शिव की ही ऊर्जा के विस्तारित स्वरूप हैं — शिव की चेतना के Extension। वे शिव के परम विश्वस्त सेवक, रक्षक और शक्ति-धारक हैं।
जब कोई शिवगण किसी लिंग की स्थापना करता है, तो उसमें उस गण की विशिष्ट शक्ति स्थायी रूप से समाहित हो जाती है। जैसे — घंटाकर्ण द्वारा स्थापित घंटाकर्णेश्वर में 'नाद-शक्ति' और 'पिशाच-मुक्ति शक्ति' विद्यमान है।
स्कंद पुराण काशी खंड के अनुसार शिवगण आज भी सूक्ष्म रूप में काशी में विद्यमान हैं और अपने शिवलिंगों की निरंतर उपासना कर रहे हैं। दंडपाणि, भैरव, घंटाकर्ण आदि गण काशी के जाग्रत रक्षक देवता हैं।
ये लिंग काशी के आध्यात्मिक रक्षा-तंत्र और अन्तर्गृह परिक्रमा का अभिन्न अंग हैं।





