विस्तृत उत्तर
यह मान्यता है कि घंटाकर्णेश्वर महादेव के दर्शन और यहाँ घंटे की ध्वनि से मानसिक विकार दूर होते हैं। इसका तार्किक विश्लेषण इस प्रकार है —
प्रत्यक्ष श्लोक-प्रमाण — स्कंद पुराण या शिव पुराण में ऐसा कोई श्लोक नहीं जो शब्दशः कहता हो कि यहाँ घंटे सुनने से उन्माद ठीक होता है।
पिशाच-वृत्ति नाश का सिद्धांत — घंटाकर्ण स्वयं पिशाच थे। आयुर्वेद (चरक संहिता) और तंत्र शास्त्रों में उन्माद, अपस्मार जैसे रोगों को 'भूत-पिशाच बाधा' से जोड़ा गया है। चूँकि घंटाकर्ण ने स्वयं पिशाच वृत्ति से मुक्ति पाई, अतः आगमिक मान्यता है कि जो इनकी आराधना करता है, वह भी मानसिक विकृतियों से मुक्त हो जाता है — जो स्वयं रोग से मुक्त हुआ, वही उसका संहारक देवता बनता है।
नाद-योग आधार — घंटों की लयबद्ध गूँज स्नायु तंत्र को शांत करती है, मस्तिष्क की तरंगें बीटा (तनाव) से अल्फा-थीटा (शांति-ध्यान) की ओर जाती हैं।
निष्कर्ष — यह 'तांत्रिक नाद-योग सिद्धांत और पिशाच-मुक्ति आख्यान पर आधारित सुदृढ़ लोक-परंपरा' है — प्रत्यक्ष श्लोक-प्रमाणित नहीं, सिद्धांत-प्रमाणित।





