विस्तृत उत्तर
भारतीय नाद-योग में ध्वनि दो प्रकार की है —
आहत नाद (Struck Sound) — वह ध्वनि जो दो वस्तुओं के टकराने से उत्पन्न होती है। जैसे — घंटा बजाना, ढोल बजाना, ताली बजाना, बोलना। यह बाहरी, भौतिक और क्षणिक ध्वनि है — उत्पन्न होती है, गूँजती है, फिर शांत हो जाती है।
अनाहत नाद (Unstruck Sound) — वह दिव्य ध्वनि जो बिना किसी आघात के स्वतः सदा विद्यमान है। यह ब्रह्मांड का मूल स्पंदन — ॐ का शाश्वत नाद। सांसारिक कोलाहल में दबा रहता है, गहन ध्यान में योगी इसे भीतर सुनता है।
घंटाकर्णेश्वर तीर्थ का रहस्य इन दोनों के संबंध में है। मंदिर का घंटा बजने पर (आहत नाद) उसकी गूँज का अंतिम छोर — जहाँ ध्वनि मौन में विलीन होती है — वही बिंदु है जहाँ साधक अनाहत नाद पकड़ता है। घंटाकर्ण ने लौकिक नाद को दिव्य नाद में रूपांतरित किया।





