विस्तृत उत्तर
नाद-ब्रह्म का अर्थ है — शब्द या ध्वनि के रूप में परमतत्त्व (ईश्वर) की अनुभूति। शैव-सिद्धांत, कश्मीरी शैव दर्शन और तंत्र शास्त्रों (मालिनीविजयोत्तर तंत्र, स्वच्छंद तंत्र) के अनुसार, यह संपूर्ण ब्रह्मांड परम शिव के 'नाद' या 'स्पंदन' से उत्पन्न हुआ है।
जब परब्रह्म शिव सृष्टि की इच्छा करते हैं, तो वह प्रथम इच्छा 'नाद' के रूप में प्रकट होती है — यही नाद घनीभूत होकर 'बिंदु' बनता है। वेद और उपनिषद इसी नाद को 'ॐ' (प्रणव) कहते हैं।
भगवान शिव स्वयं नाद के अधिपति हैं। उनके डमरू से उद्भूत १४ माहेश्वर सूत्र संपूर्ण भाषा, संगीत और लौकिक स्पंदन का मूल हैं। शिव को 'नाद-ब्रह्म' कहा गया है — वे श्वास के स्पंदन और हृदय की धड़कन में भी विद्यमान हैं।
स्कंद पुराण काशी खंड (अध्याय ११) में चार वाद्य — तत, वितत, घन और सुषिर — का उल्लेख है। 'घन' वाद्य (मंजीरा, घंटा) आघात से ध्वनि उत्पन्न करते हैं। घनकर्णेश्वर इसी 'घन' नाद के अधिष्ठाता देवता हैं।





