विस्तृत उत्तर
हमारे उपनिषद् और दर्शन शास्त्र उद्घोषणा करते हैं कि सृष्टि के आरम्भ से पूर्व केवल एक ही सत्ता थी — परब्रह्म। वह परमसत्ता अचिन्त्य, अगोचर और निर्गुण-निराकार थी।
जब उस एक सत्ता में 'एको हं बहुस्याम्' (मैं एक हूँ, अनेक हो जाऊँ) का संकल्प स्फुरित हुआ, तो उस निर्गुण में एक स्पंदन उत्पन्न हुआ।
यही आदिम स्पंदन नाद-ब्रह्म या शब्द-ब्रह्म कहलाया। यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त अनाहत ध्वनि है, जिसे योगीजन अपनी गहन समाधि की अवस्था में सुनते हैं।





