विस्तृत उत्तर
वेद और तंत्र शास्त्र एकमत से यह घोषणा करते हैं कि इस सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति एक दिव्य ध्वनि, एक अनाहत नाद से हुई है।
जब परब्रह्म ने 'एकोऽहं बहुस्याम' (मैं एक हूँ, बहुत हो जाऊँ) का संकल्प किया, तो उनमें जो प्रथम स्पंदन हुआ, वही 'नाद' था। इसी नाद से सम्पूर्ण ब्रह्मांड की रचना हुई।
इसीलिए भारतीय मनीषियों ने शब्द को ही 'ब्रह्म' कहा है, क्योंकि शब्द ही ईश्वर का स्वरूप है और उसी से जगत की प्रक्रिया आरंभ होती है।
योगियों को गहन समाधि में आज भी वह 'अनाहत नाद' (बिना किसी आघात के उत्पन्न ध्वनि) सुनाई देता है, जो इस सृष्टि का मूल संगीत है।





