विस्तृत उत्तर
नाद ध्यान या नाद योग एक प्राचीन साधना है जिसमें ध्वनि को ईश्वर तक पहुँचने का माध्यम माना जाता है। 'नाद' शब्द का अर्थ है ध्वनि — वह ध्वनि जो समस्त सृष्टि में व्याप्त है।
नाद दो प्रकार का होता है — आहत नाद (जो दो वस्तुओं के टकराने से उत्पन्न होता है, जैसे संगीत के वाद्ययंत्रों की ध्वनि) और अनाहत नाद (जो बिना किसी बाहरी आघात के भीतर से उत्पन्न होता है — योगी इसे गहरे ध्यान में सुनते हैं)।
अनाहत नाद साधना — दोनों कानों को अँगूठों से बंद करके (शंभवी मुद्रा में) एकाग्रचित्त होकर भीतर से आती सूक्ष्म ध्वनियों को सुनने का प्रयत्न किया जाता है। प्रारंभ में 'सांय-सांय', 'झनझनाहट' जैसी ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। परिपक्व साधना में शंख, मृदंग, वीणा और अंततः ओंकार की दिव्य ध्वनि सुनाई देती है। योग शास्त्रों में दस प्रकार के अनाहत नादों का वर्णन है।
हठयोग प्रदीपिका में लिखा है — 'नादोपासन करें जिन्हें तत्वबोध न हो सके' — अर्थात् नाद ध्यान उन साधकों के लिए भी उपयुक्त है जिन्हें ज्ञान मार्ग कठिन लगता है। संगीत के माध्यम से किया गया ध्यान भी नाद योग का एक रूप है — भरतीय शास्त्रीय संगीत परंपरा में नाद को ब्रह्म का स्वरूप माना जाता है। 'नादब्रह्म' — नाद ही ब्रह्म है — यह सनातन की मान्यता है।





