विस्तृत उत्तर
अहम् ब्रह्मास्मि' — यह बृहदारण्यक उपनिषद (1.4.10) का महावाक्य है जिसका अर्थ है — 'मैं ब्रह्म हूँ।' यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि ब्रह्म-बोध की समाधि-अवस्था का वर्णन है।
इसका ध्यान करने से तात्पर्य है — इस महावाक्य के अर्थ को बौद्धिक स्तर से गहरे अनुभव के स्तर तक ले जाना।
विधि — शांत स्थान पर सुखासन में बैठें। श्वास पर कुछ मिनट ध्यान देकर मन शांत करें। अब मन में एक-एक शब्द को धीरे-धीरे दोहराएं — 'अहम्' — अर्थात् यह 'मैं' जो शरीर नहीं है, मन नहीं है, विचार नहीं है — वह शुद्ध चेतना है। 'ब्रह्म' — वह अनंत, अखंड, सर्वव्यापी सत्ता। 'अस्मि' — हूँ — इन दोनों की एकता। भावना करें कि यह शरीर आकाश में है, यह शरीर ब्रह्म में है, यह चेतना ब्रह्म ही है।
यह साधना केवल वाक्य रटने से नहीं होती — इसके लिए पहले 'नेति-नेति' विचार आवश्यक है — मैं शरीर नहीं, मन नहीं, बुद्धि नहीं — जो शेष रहे वह ब्रह्म। बृहदारण्यक उपनिषद (2.3.6) में 'नेति-नेति' — 'यह नहीं, यह नहीं' — इस निराकरण के बाद जो शेष बचे वही आत्मा-ब्रह्म है।
यह उच्च-कोटि की साधना है। प्रारंभिक साधकों को पहले ईश्वर-भक्ति, जप और ध्यान की नींव तैयार करनी चाहिए। अनुभवी गुरु के मार्गदर्शन में यह साधना और फलदायी होती है।