विस्तृत उत्तर
सोहम (सो + अहम्) एक अत्यंत प्राचीन और शक्तिशाली साधना है जिसे 'अजपा जाप' भी कहते हैं — अर्थात् वह जाप जो बिना संकल्प के स्वतः होता रहता है।
सो' का अर्थ है 'वह' (परमात्मा), और 'हम' का अर्थ है 'मैं' (जीवात्मा)। 'सोहम' का भाव है — 'वह ब्रह्म ही मैं हूँ' — यह वेदांत का महावाक्य 'अहम् ब्रह्मास्मि' का ही श्वास-रूप है।
गोरक्ष संहिता (41-42) में वर्णित है कि प्रत्येक मनुष्य की श्वास में स्वतः 'सो' (श्वास लेते समय) और 'हम्' (श्वास छोड़ते समय) की ध्वनि होती रहती है। 24 घंटे में यह लगभग 21,600 बार होता है। अधिकांश लोग इसे नहीं पकड़ पाते — सोहम साधना इसी को सचेतन बनाती है।
विधि — पद्मासन या सुखासन में शांत होकर बैठें। शरीर शिथिल करें। श्वास लेते समय मन में 'सोऽऽऽ' सुनें और भावना करें कि परमात्मा का प्रकाश भीतर आ रहा है। श्वास छोड़ते समय 'हम्ऽऽऽ' सुनें और भावना करें कि अहंकार और कल्मष बाहर जा रहा है। 'मैं वही हूँ' का भाव गहराता जाए।
यह साधना शनैः-शनैः मन को इस भाव में पक्का करती है कि जीव और ब्रह्म वस्तुतः एक हैं — यही वेदांत का परम सत्य है। किसी मंत्र की आवश्यकता नहीं, कोई विशेष दीक्षा की आवश्यकता नहीं — श्वास ही मंत्र है।





