विस्तृत उत्तर
त्राटक हठयोग की षट्कर्म (छह शुद्धिकरण क्रियाओं) में से एक है। इसका उल्लेख हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता दोनों में मिलता है। 'त्राटक' शब्द का अर्थ है — बिना पलक झपकाए किसी एक बिंदु या वस्तु पर दृष्टि को स्थिर करना।
त्राटक दो प्रकार का होता है — बाह्य त्राटक जिसमें किसी बाहरी वस्तु (दीपक की लौ, बिंदु, देवता का चित्र, स्वस्तिक चिह्न) पर आँखें स्थिर की जाती हैं। और आंतर त्राटक जिसमें आँखें बंद कर मस्तिष्क में उसी वस्तु का चित्र ध्यान में धारण किया जाता है।
विधि — शांत और एकांत स्थान में पद्मासन, सिद्धासन या सुखासन में बैठें। जिस वस्तु पर त्राटक करना हो उसे आँखों के बराबर की ऊँचाई पर लगभग तीन फुट की दूरी पर रखें। शरीर और मन को शिथिल छोड़ें। अब बिना पलक झपकाए उस वस्तु को एकाग्र और शांत भाव से देखते रहें। जब आँखों में पानी आ जाए तो आँखें बंद कर उस छवि को मानसिक नेत्रों से देखें। जब छवि धुंधली हो जाए तो फिर आँखें खोलकर दोबारा देखें। इस क्रम को दोहराते रहें।
लाभ — मन की एकाग्रता में वृद्धि होती है, नेत्र-शक्ति बढ़ती है, मनोमय कोश की शुद्धि होती है, ध्यान के लिए मन तैयार होता है। हठयोग प्रदीपिका में कहा गया कि त्राटक से नेत्र रोग और आलस्य दूर होता है।
सावधानी — बल या जबरदस्ती से पलक न रोकें। जोर-जबरदस्ती से आँखों को नुकसान हो सकता है।



