विस्तृत उत्तर
ध्यान में मन भटकना — यह हर साधक का अनुभव है। जो ध्यान करता है, केवल वही यह अनुभव करता है — जो करता ही नहीं वह इसे नहीं जानता। इसलिए यह प्रश्न उठना ही साधना की शुरुआत का संकेत है।
भगवद गीता का समाधान — अर्जुन ने भी यही प्रश्न किया था — 'चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम्' — मन बड़ा चंचल है। श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया — 'अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते' — अभ्यास और वैराग्य से मन को वश में किया जा सकता है।
व्यावहारिक उपाय:
श्वास पर ध्यान — जब मन भटके तो धीरे से श्वास पर वापस लाएँ। श्वास की गति को देखते रहें — यह सबसे सरल और प्रभावी तरीका है।
मन को डाँटें नहीं — जब मन भटके, उसे जबरदस्ती मत रोकें। बस 'देखें' कि वह कहाँ गया और धीरे से वापस लाएँ — जैसे बच्चे को प्रेम से बुलाते हैं।
मूर्ति या ज्योति पर ध्यान — किसी मूर्ति, दीपक की ज्योति या भृकुटि के मध्य पर दृष्टि केंद्रित करें — 'त्राटक' — यह एकाग्रता बढ़ाता है।
नाम-जप के साथ — ध्यान के साथ मन में मंत्र या नाम जपते रहें — यह मन को लंगर देता है।
छोटा समय — शुरुआत में 5-10 मिनट ध्यान करें। जबरदस्ती आधे घंटे बैठने से थकान और निराशा होती है।
नियमितता — ध्यान एक कौशल है — जितना नियमित अभ्यास होगा, मन उतना शांत होता जाएगा।




