विस्तृत उत्तर
यह एक बहुत ईमानदार प्रश्न है जो लगभग हर साधक के जीवन में आता है। पूजा में मन न लगना कोई पाप नहीं है — यह मन की एक स्वाभाविक अवस्था है।
आध्यात्मिक कारण:
मन का बाहर भटकना — मन स्वभाव से 'चंचल' है। उपनिषदों में कहा — 'मन एव मनुष्याणां कारणं बन्ध-मोक्षयोः' — मन ही बंधन और मुक्ति का कारण है। मन को नियंत्रित करना ही साधना है।
सांसारिक व्यस्तता — जब जीवन में बहुत चिंताएँ, तनाव और जिम्मेदारियाँ हों, तो पूजा के समय भी वे मन में घूमती रहती हैं।
पूजा यांत्रिक हो गई है — जब हर दिन एक ही रूटीन में बिना भाव के पूजा हो — तो मन उससे ऊबने लगता है।
भक्ति का भाव नहीं जगा — भगवान से प्रेम का अनुभव न हुआ हो तो पूजा 'कर्तव्य' लगती है, 'आनंद' नहीं।
पाप-कर्म — कुछ शास्त्रों में कहा गया है कि अत्यधिक पाप-कर्म या असत्य आचरण से भी पूजा में मन नहीं लगता।
क्या करें:
भाव बदलें — पूजा को 'काम' की तरह न करें। इष्टदेव के सामने बैठकर पहले उन्हें मन से देखें, उनसे बात करें।
सुगंध और संगीत — पूजा में धूप, दीप, भजन का उपयोग करें — ये इंद्रियों को शांत करके मन को एकाग्र करते हैं।
कम और भावपूर्ण — एक घंटे की यांत्रिक पूजा से बेहतर है 10 मिनट की हृदयपूर्ण प्रार्थना।





