विस्तृत उत्तर
तांत्रिक ग्रंथ एक असाधारण दार्शनिक समानता बताते हैं: 'जिस प्रकार सभी धातुओं में पारा (पारद) सर्वाधिक चंचल और अस्थिर है, उसी प्रकार मनुष्य का मन भी सर्वाधिक चंचल है।'
जब 'नियमन' संस्कार द्वारा पारे को स्थिर किया जाता है, तो उस सिद्ध पारद शिवलिंग पर ध्यान करने से साधक का मन भी प्राकृतिक रूप से एकाग्र होने लगता है।
इस प्रकार, पारे का 'बंधन' साधक के 'मन का बंधन' बन जाता है।




