विस्तृत उत्तर
रसशास्त्र के ग्रंथों में पारद के कुल 'अष्टादश' संस्कारों का विधान है। परन्तु, 'रसरत्नसमुच्चय' यह भी स्पष्ट करता है कि इनमें से प्रथम 'अष्ट-संस्कार' (आठ प्रक्रियाएं) ही 'देहसिद्धि' (कायाकल्प या औषधीय प्रयोग) के लिए मुख्य हैं।
शिवलिंग निर्माण के लिए भी इन्हीं आठ संस्कारों को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है।
ये आठ संस्कार पारद के नैसर्गिक दोषों (जैसे विष, मल, चापल्य, अग्नि दोष आदि) को दूर कर, उसमें दिव्य गुणों को जाग्रत करने के लिए किये जाते हैं।
प्रमुख संस्कार:
- 1स्वेदन — पारद के स्थूल मल और बाह्य अशुद्धियों को दूर करना
- 2मर्दन — पारद के कणों को सूक्ष्म करना
- 3मूर्छना — पारद के विष-दोष को समाप्त करना
- 4नियमन — पारद की चंचलता को नियंत्रित करना
- 5दीपन — पारद में अन्य धातुओं को 'ग्रास' करने की क्षमता जाग्रत करना
- 6बंधन — पारद को ठोस स्वरूप देना





