विस्तृत उत्तर
पूजा में ध्यान क्यों आवश्यक है — इसका उत्तर शास्त्र बहुत स्पष्ट रूप से देते हैं:
भगवद्गीता (17.11-12) — तामसिक और सात्विक पूजा का भेद
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः।।'
— जो पूजा विधिपूर्वक, फल की इच्छा छोड़कर, मन को एकाग्र (समाधाय) करके की जाए — वह सात्विक है। और:
अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तां यज्ञं विद्धि राजसम्।।'
— जो पूजा दिखावे के लिए और मन बिखरे हुए हो — वह राजसिक (निम्न) है।
ध्यान के बिना पूजा क्यों अधूरी है
1बिना ध्यान के पूजा — केवल क्रिया, शक्ति नहीं
पातञ्जल योगसूत्र (1.2): 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।' — मन की वृत्तियाँ रुकने पर ही आत्मा का स्वरूप प्रकट होता है। बिना ध्यान के मन बाहर भटकता रहता है — फिर पूजा का लाभ शरीर तक सीमित रह जाता है, आत्मा तक नहीं पहुँचता।
2भगवद्गीता (3.6) — बाह्य क्रिया और मन का विरोध
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते।।'
— जो बाह्य रूप से क्रिया करे और मन इंद्रिय-विषयों में भटके — वह 'मिथ्याचारी' है। अर्थात् शरीर पूजा करे और मन बाजार में हो — यह पूजा नहीं।
3ध्यान से पूजा का फल अनंत गुना बढ़ता है
भागवत पुराण (11.14.21): 'यथाग्निः सुसमृद्धार्चिः करोत्येधांसि भस्मसात्।' — जैसे प्रदीप्त अग्नि लकड़ी जलाती है, वैसे ध्यानयुक्त भक्ति संचित कर्मों को नष्ट करती है। बिना ध्यान के — अग्नि धीमी पड़ती है।
4मनुस्मृति (4.23) — नित्य पूजा में चित्त-शुद्धि
नित्य पूजा का उद्देश्य केवल कर्मकांड नहीं — चित्त की शुद्धि है। यह शुद्धि तभी होती है जब मन पूजा में उपस्थित हो।
5भगवद्गीता (12.8-9) — ध्यान ही भक्ति का हृदय
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः।।'
— पूजा का अंतिम लक्ष्य यही है — मन और बुद्धि भगवान में स्थिर हों। यह ध्यान के बिना असंभव है।
संक्षेप में
ध्यान के बिना पूजा = शरीर का व्यायाम। ध्यान के साथ पूजा = आत्मा का पोषण। ध्यान पूजा को यांत्रिक क्रिया से जीवंत साधना में बदलता है।





