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ध्यान📜 पतञ्जलि योगसूत्र, भगवद्गीता, विवेकचूडामणि1 मिनट पठन

ध्यान के दौरान क्या सोचना चाहिए?

संक्षिप्त उत्तर

ध्यान में 'सोचना' नहीं — एकाग्र होना है। पतञ्जलि: एक विषय पर अखंड प्रवाह = ध्यान। करें: इष्ट-मूर्ति, मंत्र-ध्वनि, श्वास-दर्शन, प्रकाश-ध्यान। न करें: योजना, चिंता, कल्पना। गीता (6.25): 'किसी का भी चिंतन न करें।'

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विस्तृत उत्तर

शास्त्रों के अनुसार ध्यान में 'सोचना' नहीं, बल्कि एकाग्र होना है।

मूल सिद्धांत

पतञ्जलि योगसूत्र (3.2): 'तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्।' — एक ही विषय पर अखंड प्रवाह ध्यान है। ध्यान में विचारों की बहुलता नहीं होती।

क्या करें

  • इष्ट-मूर्ति का स्मरण करें — रूप, रंग, आभूषण, मुस्कान का
  • ॐ या मंत्र की ध्वनि को मन में सुनें
  • श्वास को देखें — न रोकें, न बदलें, केवल देखें
  • प्रकाश (हृदय में श्वेत/स्वर्णिम प्रकाश) का ध्यान करें

क्या न करें

  • योजना, चिंता, कल्पना न करें
  • भूत या भविष्य के विचार न चलाएँ

भगवद्गीता (6.25): 'शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया। आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्।' — धीरे-धीरे मन को आत्मा में स्थापित करें, किसी का भी चिंतन न करें।

विवेकचूडामणि: विचार ध्यान की बाधा है, वस्तु ध्यान का माध्यम है।

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शास्त्रीय स्रोत
पतञ्जलि योगसूत्र, भगवद्गीता, विवेकचूडामणि
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ध्यान के दौरान क्या सोचना चाहिए — शास्त्रों के अनुसार

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