विस्तृत उत्तर
शास्त्रों के अनुसार ध्यान में 'सोचना' नहीं, बल्कि एकाग्र होना है।
मूल सिद्धांत
पतञ्जलि योगसूत्र (3.2): 'तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्।' — एक ही विषय पर अखंड प्रवाह ध्यान है। ध्यान में विचारों की बहुलता नहीं होती।
क्या करें
- ▸इष्ट-मूर्ति का स्मरण करें — रूप, रंग, आभूषण, मुस्कान का
- ▸ॐ या मंत्र की ध्वनि को मन में सुनें
- ▸श्वास को देखें — न रोकें, न बदलें, केवल देखें
- ▸प्रकाश (हृदय में श्वेत/स्वर्णिम प्रकाश) का ध्यान करें
क्या न करें
- ▸योजना, चिंता, कल्पना न करें
- ▸भूत या भविष्य के विचार न चलाएँ
भगवद्गीता (6.25): 'शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया। आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्।' — धीरे-धीरे मन को आत्मा में स्थापित करें, किसी का भी चिंतन न करें।
विवेकचूडामणि: विचार ध्यान की बाधा है, वस्तु ध्यान का माध्यम है।




