विस्तृत उत्तर
भजन और ध्यान का संबंध भक्ति मार्ग में 'नामसंकीर्तन' के माध्यम से है।
शास्त्रीय आधार
भागवत पुराण (11.5.36): 'कृते यद् ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः। द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात्।' — जो फल सतयुग में ध्यान से, त्रेता में यज्ञ से, द्वापर में पूजा से मिलता था, वही कलियुग में भजन-कीर्तन से मिलता है।
ध्यान के अनुकूल भजन-प्रकार
- 1ॐकार गान — शांत, एकाग्र मन के लिए सर्वश्रेष्ठ
- 2विष्णु सहस्रनाम — विष्णु-ध्यान के साथ
- 3महामृत्युंजय जप — शिव-ध्यान के साथ
- 4हनुमान चालीसा — शक्ति और भक्ति के लिए
- 5सूर के पद, मीराबाई के भजन — प्रेम-भक्ति के लिए
महत्त्वपूर्ण सिद्धांत
- ▸भजन धीमे, शांत स्वर में — ध्यानावस्था बनाए
- ▸उच्च स्वर वाला कीर्तन — ध्यान के पूर्व मन को एकाग्र करने के लिए
- ▸भजन के बाद मौन ध्यान — सर्वोत्तम क्रम
नारद भक्ति सूत्र (37): 'लोकेऽपि भगवद्गुणश्रवणकीर्तनम्।' — जगत में भी भगवान के गुणों का श्रवण-कीर्तन भक्ति का मार्ग है।





